Category: Scribble with a Scheme – हिंदी

इस श्रेणी में हम हिंदी भाषा में रंगीन और महसूसी कविताओं को साझा करेंगे। यहाँ अलंकार, भावनाओं, और विचारों का खेल बयां होता है जो शब्दों के माध्यम से जीवन की सच्चाई को परिपूर्ण करते हैं। इस कविता की दुनिया में आकर आप भावों के साथ साथ भावनाओं को भी महसूस करेंगे। चाहे वह प्रेम की बात हो या जीवन के ताल्लुकात, यहाँ आपको हर वह कवितायेँ मिलेगी जो आपके दिल को छू जाने और सोच पर गहरा प्रभाव छोड़ने की चेष्टा करेंगी।

  • “कौन हो तुम” – Poem

    “कौन हो तुम” – Poem

    कौन हो तुम?
    जो बांधते हो मुझे मेरी ही पौराणिक छवि से
    और दागते हो आज ये सवाल
    कि क्या मैं मैं हूँ कि नहीं?

    कौन हो तुम?
    जो मेरे सवालों के मेरे ही जवाबों को
    अपने सवालों की कसौटी पर कसते हो
    ये कहते हुए कि तुम तो ऐसे थे नहीं?

    कौन हो तुम?
    जिसके अपने अज्ञात सत्य की तलाश
    मेरे अर्धसत्य में निहित है
    परन्तु इसका मुझे कोई ज्ञान नहीं?

    कौन हो तुम?
    जिसका अंधविश्वास कायरता की बुनियाद पर
    मेरी दिशा को दिशाहीन ठहराता है
    और मेरे विश्वास को मारी हुई मति?

    कौन हो तुम?
    जिसकी डगमगाती नींव को
    मेरे प्रश्नों से कम्पन महसूस होती है
    और मैं ज्ञात होता हूँ शत्रुरूपी?

    कौन हो तुम?
    क्यूंकि जो भी हो तुम
    मेरे दोस्त, कदापि नहीं।

  • देखो

    देखो

    मेरी प्यास से सूखे हुए चेहरे की दरारें नहीं,
    आँखों में पानी को चाहने की जद्दोज़हद देखो।




  • “हमरास्ता” – Poem

    “हमरास्ता” – Poem

    हर दो कदम पर ठिठक कर, आस पास नज़रें घुमाता हूँ।
    दूर किसी राह पर कोई साया दिखे,
    तो मुँह मोड़ कर इमारतों के जंगलों में गायब हो जाता हूँ।
    पक्के रास्तों से कभी बनी नहीं,
    कच्ची राहों में वो नमी नहीं।
    जहां कदम चले, वहीं आगे बढ़ जाता हूँ।

    भटक जाता हूँ अपने आप को खोजने की कवायद में,
    मेरे रास्ते पर चलने वाले ज़मीं पर निशाँ नहीं छोड़ते।

  • “गुम” – Poem

    “गुम” – Poem

    मैं गुम हो चला हूँ,
    कहीं खो गया हूँ,
    लावारिस पड़ा हूँ,
    कहाँ आ गया हूँ?

    ये राहें नई सी,
    नज़ारे पुराने,
    कदम आगे-आगे,
    समय पीछे भागे।

    है डर संगी-साथी,
    तन्हाई परछाईं,
    हूँ बेड़ी मैं खुद की,
    मैं खुद की रिहाई।

    धुंधले कुछ इरादे,
    बदनीयत के तकाज़े,
    शराफत का चोला,
    मासूमियत के लबादे।

    मैं थक सा गया हूँ,
    बताता नहीं हूँ,
    कईं नज़रें चुप हैं,
    कईं चेहरे गुम हैं।

    मैं भी गुमशुदा हूँ,
    वहीं खो गया हूँ,
    ना हक़ हूँ किसी का,
    यहीं घुल गया हूँ।

    – absinraw

  • “याद तो तुम्हें मेरी आती ही होगी” – Poem

    “याद तो तुम्हें मेरी आती ही होगी” – Poem

    झुठलाना मत
    याद तो तुम्हें मेरी आती ही होगी।

    घाट की आड़ में जब चाँद चुप छुपता रहा,
    तारों की चादर से लिपटी नींद भी जाती रही,
    तुम थीं, मैं था, रात थी खामोशी के संग साथ में,
    लफ़्ज़ों का क्या काम था जब सांसों के संग सांस थी।

    कदमों का रुख उस डगर हो
    जब टिमटिमाती रात में,
    झुठलाना मत
    याद तो तुम्हें मेरी आती ही होगी।

    वो समंदर का किनारा रेत के टीले तले,
    और तुम्हारी अंगड़ाइयाँ उस तपन की छाँव में,
    शाम का मंजर सुहाना, रात बारिश की हुई,
    हम वहीं के रह गए वहीं, तेरे तकिये के सिरे।

    गर कभी सपनों में अचानक
    फिर मेरा दीदार हो,
    झुठलाना मत
    याद तो तुम्हें मेरी आती ही होगी।

    कहने को छोटी उमर थी इस सफर की पर मगर
    दम उड़ानों की नीयत में वक्त से आगे की थी,
    ज़िंदा है अब भी चिंगारी, फिर भले ही खुद जले
    आग अब भी है कि जलता ज़िन्दगी भर दिल रहे।

    तुमसे शुबहा ना शिकायत
    मैं ही ज़िम्मेदार हूँ,
    मगर झुठलाना मत
    याद तो तुम्हें मेरी आती ही होगी।

    लिखने का कुछ शौक सा था, कुछ अनकही अनसुनी,
    अब है लत, ये हाथ स्याही की तलब के मारे हैं,
    रोज़ का इनका मचलना, रोज़ उपज एक नज़्म की
    ना मायने अदब-ओ-ज़बान के, हर किस्से कहानी तुम्हारे हैं।

    माना तुम हो दूर इतनी
    मुझसे कोई नाता नहीं,
    झुठला दो फिर भी इस झूठ को
    क्योंकि याद तो तुम्हें मेरी आती ही होगी।