Category: Scribble with a Scheme – हिंदी

इस श्रेणी में हम हिंदी भाषा में रंगीन और महसूसी कविताओं को साझा करेंगे। यहाँ अलंकार, भावनाओं, और विचारों का खेल बयां होता है जो शब्दों के माध्यम से जीवन की सच्चाई को परिपूर्ण करते हैं। इस कविता की दुनिया में आकर आप भावों के साथ साथ भावनाओं को भी महसूस करेंगे। चाहे वह प्रेम की बात हो या जीवन के ताल्लुकात, यहाँ आपको हर वह कवितायेँ मिलेगी जो आपके दिल को छू जाने और सोच पर गहरा प्रभाव छोड़ने की चेष्टा करेंगी।

  • “चलो चलें” – Poem

    चलो चलें,

    कि अब जो रास्ते मुख़ातिब हुए,
    वो नज़रों के दायरे में पहले ना थे।

    कि ख़्वाब जो बंद लिफाफों में रखे,
    काग़ज़ों के पुलिंदों से गहरे ना थे।

    कि ढल गया है सूरज, पता है।
    दागदार चाँद आज भी दगाबाज़ है।

    कि जितना लंबा साथ था,
    आज हमउम्र उसकी बस याद है।

    कि तन्हा यहाँ कब तक करूँ गुज़ारा,
    हर जगह मेरा ही सामान है।

    कि ढूँढ है तुम्हारी यहाँ वहाँ,
    पर तुम यहाँ कहाँ।
    तुम हो वहाँ जहाँ
    ना मेरा कोई नामोनिशान है।

    कि एकबारगी तुम कोस लेतीं,
    मैं खुद दिन में सौ मर्तबा अपना ही गुनाहगार हूँ।

    कि हक़ीक़त थीं तुम मेरी,
    कोई सपना नहीं।
    किस मुँह से मैं खुद को जवाब दूँ।

    कि खो चुका हूँ एक हिस्सा अपना मैं
    यादों की बारात में।

    कि धंस चुकी है ज़िंदा लाश, बाकी जितनी,
    ज़िंदगी के शमशान में।

    कि हाथ में मेरे हैं कुछ चिथड़े
    दामन-ए- उम्मीद के।

    कि थक गया हूँ मैं, सुस्ता लूँ ज़रा,
    मूँद आँखें संग आग़ाज़-ए-शब के।

  • “क्या से क्या बन गए” – Poem

    टूट कर बिखरे हुए उम्मीद की मेरी,
    कंकड़ ये कांच के हैं अब नासूर बन गए।

    जिस इबादत के नशे में धुत था मैं कामिल,
    उस ख़ुदा के अश्क साझा शौक बन गए।

    वक़्त ही मरहम है, दिल के घाव गहरे हैं,
    कुछ रश्क भरी हैं ख्वाहिशें, जिन पर सब पहरे हैं।

    दरख़्त-ए-दिल की शाखों में जितने घरोंदे थे,
    मुफलिसी की हर परिंदे के फरमान बन गए।

    हम फ़ेहरिस्त-ए-आरज़ू पर दर्ज़े के अव्वल थे,
    ज़िद से नाकारा आशिको में नाम कर गए।।

  • “तो ये भी क्या बुरा है” – Poem

    कश्मकश नहीं थी ज़िन्दगी,
    जो बनकर रह गयी
    इक जद्दोजहद,
    बस धुंधली सी तस्वीर रह गयी

    तूफां से बचते-सहते गर दरार पड़ गयी,
    तो ये भी क्या बुरा है।

    बारिश की कुछ उम्मीद थी
    छाता उठा लिया,
    ख़ुदा भी था रूठा सा,
    सूरज दहका दिया

    बूँदें पसीने की थी जिनसे हम नहा गए,
    तो ये भी क्या बुरा है।

    तन्हा हम इस सफ़र के
    मुसाफिर हो गए,
    कुछ साथ हुए, कुछ मोड़ मिले
    कुछ राह बदल गए

    तन्हाई गर एक हमसफ़र से ज़्यादा साथ दे,
    तो ये भी क्या बुरा है।

    दुनिया में सब निराले,
    अँखियाँ मूँद भ्रांतियां पाले
    इंसानियत से ना सरोकार,
    है अंधे आँखों वाले

    जब अंधे की इंसानियत आँखों पर भारी पड़े,
    तो ये भी क्या बुरा है।

     

  • “बचपन से पचपन” – Poem

    है एक समय की बात पुरानी ,
    अजब कहानी।

    शुरुआत उसकी दमदार बड़ी!
    अँखियाँ आपस लड़ हार मरी।

    था एक लड़का,
    और एक लड़की।
    यहीं हर बार तो होता है।

    पहले क्यूटी है, बाबू, शोना है,
    फिर तो बस, रोना है।

    पर इनका प्यार पुराना था,
    जैसे वो बचपन से पचपन वाला..

    लड़का थोड़ा दीवाना था..
    ख्वाब हॉलीवुड,
    खुद बॉलीवुड।

    लड़की रहती मद्धम आंच पे।
    ना कभी उबलती,
    ना तवे से उतरती।

    बर्तन हमेशा बजते..
    घर-घर की यहीं कहानी।
    फिर भी गाडी इनकी थी पटरी पर..
    वो लड़की ना थी कम दीवानी..

    जोड़ी रहे सलामत!
    यहीं दुआ सब देते थे..
    अँधेरे ने पर कब किसी की मानी है..

    रौशनी जब होती है चरम पर,
    बस! तभी तो उसे अपनी धाक जमानी है..

    कुछ किलोमीटर आ गए बीच में
    तो क्या हुआ?
    देख लेंगे इनको भी!
    ऐसा दोनों ने सोचा था..

    लड़की बोली,
    ये दायरा है मेरा.
    इससे बाहर मत जाना.

    पर जो ना बोला था,
    वही तो होना था..
    बस थोड़ी सी चहलक़दमी,

    बाहर दुनिया अलग थी।
    नए लोग, नयी रीत..
    नए तबके..

    ये सब तो नया है!
    सिर्फ लड़के ने ही तो देखा है!
    और वो दायरा छोटा पड़ गया..

    बाहर की चमक थी,
    फीकी तो पड़नी ही थी..
    आखिर घर तो घर ही होता है।

    यहीं तो गलत कर गया दीवाना.
    दीवानापन धीमे-धीमे धुंधला गया..

    वो दायरा मजबूरी नहीं थी,
    विश्वास था जिसे जुठला दिया.

    अब पछताए क्या होत है,
    जब चिड़िया चुग गयी खेत..

    वो प्यार था ना,
    बचपन से पचपन वाला?
    बीत गए थे उनके पचपन साल..

    वो क्या है ना,
    जो दायरा था ना!
    उसके बाहर टाइम भागता थोड़ा जल्दी है..

    क्या कहा?
    दूसरा मौका?
    कहा था ना, लड़की है,
    पर कम दीवानी नहीं..

    प्यार में धोखा तो कोई झेल भी जाये,
    विश्वास में धोखा..
    इतना आसान नहीं।

    चलो कोई बात नहीं!

    समय सब ठीक कर देगा..
    भले ही ये घाव काफी गहरा है..

    आप पर थोड़ा ध्यान रखियेगा..
    प्यार भले ही बचपन का हो,
    उसपे भी पचपन का पहरा है..