Tag: कविता

  • “कौन हो तुम” – Poem

    “कौन हो तुम” – Poem

    कौन हो तुम?
    जो बांधते हो मुझे मेरी ही पौराणिक छवि से
    और दागते हो आज ये सवाल
    कि क्या मैं मैं हूँ कि नहीं?

    कौन हो तुम?
    जो मेरे सवालों के मेरे ही जवाबों को
    अपने सवालों की कसौटी पर कसते हो
    ये कहते हुए कि तुम तो ऐसे थे नहीं?

    कौन हो तुम?
    जिसके अपने अज्ञात सत्य की तलाश
    मेरे अर्धसत्य में निहित है
    परन्तु इसका मुझे कोई ज्ञान नहीं?

    कौन हो तुम?
    जिसका अंधविश्वास कायरता की बुनियाद पर
    मेरी दिशा को दिशाहीन ठहराता है
    और मेरे विश्वास को मारी हुई मति?

    कौन हो तुम?
    जिसकी डगमगाती नींव को
    मेरे प्रश्नों से कम्पन महसूस होती है
    और मैं ज्ञात होता हूँ शत्रुरूपी?

    कौन हो तुम?
    क्यूंकि जो भी हो तुम
    मेरे दोस्त, कदापि नहीं।

  • “गुम” – Poem

    “गुम” – Poem

    मैं गुम हो चला हूँ,
    कहीं खो गया हूँ,
    लावारिस पड़ा हूँ,
    कहाँ आ गया हूँ?

    ये राहें नई सी,
    नज़ारे पुराने,
    कदम आगे-आगे,
    समय पीछे भागे।

    है डर संगी-साथी,
    तन्हाई परछाईं,
    हूँ बेड़ी मैं खुद की,
    मैं खुद की रिहाई।

    धुंधले कुछ इरादे,
    बदनीयत के तकाज़े,
    शराफत का चोला,
    मासूमियत के लबादे।

    मैं थक सा गया हूँ,
    बताता नहीं हूँ,
    कईं नज़रें चुप हैं,
    कईं चेहरे गुम हैं।

    मैं भी गुमशुदा हूँ,
    वहीं खो गया हूँ,
    ना हक़ हूँ किसी का,
    यहीं घुल गया हूँ।

    – absinraw