मेरी प्यास से सूखे हुए चेहरे की दरारें नहीं,
आँखों में पानी को चाहने की जद्दोज़हद देखो।
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“हमरास्ता” – Poem
हर दो कदम पर ठिठक कर, आस पास नज़रें घुमाता हूँ।
दूर किसी राह पर कोई साया दिखे,
तो मुँह मोड़ कर इमारतों के जंगलों में गायब हो जाता हूँ।
पक्के रास्तों से कभी बनी नहीं,
कच्ची राहों में वो नमी नहीं।
जहां कदम चले, वहीं आगे बढ़ जाता हूँ।भटक जाता हूँ अपने आप को खोजने की कवायद में,
मेरे रास्ते पर चलने वाले ज़मीं पर निशाँ नहीं छोड़ते। -

“गुम” – Poem
मैं गुम हो चला हूँ,
कहीं खो गया हूँ,
लावारिस पड़ा हूँ,
कहाँ आ गया हूँ?ये राहें नई सी,
नज़ारे पुराने,
कदम आगे-आगे,
समय पीछे भागे।है डर संगी-साथी,
तन्हाई परछाईं,
हूँ बेड़ी मैं खुद की,
मैं खुद की रिहाई।धुंधले कुछ इरादे,
बदनीयत के तकाज़े,
शराफत का चोला,
मासूमियत के लबादे।मैं थक सा गया हूँ,
बताता नहीं हूँ,
कईं नज़रें चुप हैं,
कईं चेहरे गुम हैं।मैं भी गुमशुदा हूँ,
वहीं खो गया हूँ,
ना हक़ हूँ किसी का,
यहीं घुल गया हूँ।– absinraw
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“याद तो तुम्हें मेरी आती ही होगी” – Poem
झुठलाना मत
याद तो तुम्हें मेरी आती ही होगी।घाट की आड़ में जब चाँद चुप छुपता रहा,
तारों की चादर से लिपटी नींद भी जाती रही,
तुम थीं, मैं था, रात थी खामोशी के संग साथ में,
लफ़्ज़ों का क्या काम था जब सांसों के संग सांस थी।कदमों का रुख उस डगर हो
जब टिमटिमाती रात में,
झुठलाना मत
याद तो तुम्हें मेरी आती ही होगी।वो समंदर का किनारा रेत के टीले तले,
और तुम्हारी अंगड़ाइयाँ उस तपन की छाँव में,
शाम का मंजर सुहाना, रात बारिश की हुई,
हम वहीं के रह गए वहीं, तेरे तकिये के सिरे।गर कभी सपनों में अचानक
फिर मेरा दीदार हो,
झुठलाना मत
याद तो तुम्हें मेरी आती ही होगी।कहने को छोटी उमर थी इस सफर की पर मगर
दम उड़ानों की नीयत में वक्त से आगे की थी,
ज़िंदा है अब भी चिंगारी, फिर भले ही खुद जले
आग अब भी है कि जलता ज़िन्दगी भर दिल रहे।तुमसे शुबहा ना शिकायत
मैं ही ज़िम्मेदार हूँ,
मगर झुठलाना मत
याद तो तुम्हें मेरी आती ही होगी।लिखने का कुछ शौक सा था, कुछ अनकही अनसुनी,
अब है लत, ये हाथ स्याही की तलब के मारे हैं,
रोज़ का इनका मचलना, रोज़ उपज एक नज़्म की
ना मायने अदब-ओ-ज़बान के, हर किस्से कहानी तुम्हारे हैं।माना तुम हो दूर इतनी
मुझसे कोई नाता नहीं,
झुठला दो फिर भी इस झूठ को
क्योंकि याद तो तुम्हें मेरी आती ही होगी। -
“चलो चलें” – Poem
चलो चलें,
कि अब जो रास्ते मुख़ातिब हुए,
वो नज़रों के दायरे में पहले ना थे।कि ख़्वाब जो बंद लिफाफों में रखे,
काग़ज़ों के पुलिंदों से गहरे ना थे।कि ढल गया है सूरज, पता है।
दागदार चाँद आज भी दगाबाज़ है।कि जितना लंबा साथ था,
आज हमउम्र उसकी बस याद है।कि तन्हा यहाँ कब तक करूँ गुज़ारा,
हर जगह मेरा ही सामान है।कि ढूँढ है तुम्हारी यहाँ वहाँ,
पर तुम यहाँ कहाँ।
तुम हो वहाँ जहाँ
ना मेरा कोई नामोनिशान है।कि एकबारगी तुम कोस लेतीं,
मैं खुद दिन में सौ मर्तबा अपना ही गुनाहगार हूँ।कि हक़ीक़त थीं तुम मेरी,
कोई सपना नहीं।
किस मुँह से मैं खुद को जवाब दूँ।कि खो चुका हूँ एक हिस्सा अपना मैं
यादों की बारात में।कि धंस चुकी है ज़िंदा लाश, बाकी जितनी,
ज़िंदगी के शमशान में।कि हाथ में मेरे हैं कुछ चिथड़े
दामन-ए- उम्मीद के।कि थक गया हूँ मैं, सुस्ता लूँ ज़रा,
मूँद आँखें संग आग़ाज़-ए-शब के।

