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  • “कौन हो तुम” – Poem

    “कौन हो तुम” – Poem

    कौन हो तुम?
    जो बांधते हो मुझे मेरी ही पौराणिक छवि से
    और दागते हो आज ये सवाल
    कि क्या मैं मैं हूँ कि नहीं?

    कौन हो तुम?
    जो मेरे सवालों के मेरे ही जवाबों को
    अपने सवालों की कसौटी पर कसते हो
    ये कहते हुए कि तुम तो ऐसे थे नहीं?

    कौन हो तुम?
    जिसके अपने अज्ञात सत्य की तलाश
    मेरे अर्धसत्य में निहित है
    परन्तु इसका मुझे कोई ज्ञान नहीं?

    कौन हो तुम?
    जिसका अंधविश्वास कायरता की बुनियाद पर
    मेरी दिशा को दिशाहीन ठहराता है
    और मेरे विश्वास को मारी हुई मति?

    कौन हो तुम?
    जिसकी डगमगाती नींव को
    मेरे प्रश्नों से कम्पन महसूस होती है
    और मैं ज्ञात होता हूँ शत्रुरूपी?

    कौन हो तुम?
    क्यूंकि जो भी हो तुम
    मेरे दोस्त, कदापि नहीं।

  • “याद तो तुम्हें मेरी आती ही होगी” – Poem

    “याद तो तुम्हें मेरी आती ही होगी” – Poem

    झुठलाना मत
    याद तो तुम्हें मेरी आती ही होगी।

    घाट की आड़ में जब चाँद चुप छुपता रहा,
    तारों की चादर से लिपटी नींद भी जाती रही,
    तुम थीं, मैं था, रात थी खामोशी के संग साथ में,
    लफ़्ज़ों का क्या काम था जब सांसों के संग सांस थी।

    कदमों का रुख उस डगर हो
    जब टिमटिमाती रात में,
    झुठलाना मत
    याद तो तुम्हें मेरी आती ही होगी।

    वो समंदर का किनारा रेत के टीले तले,
    और तुम्हारी अंगड़ाइयाँ उस तपन की छाँव में,
    शाम का मंजर सुहाना, रात बारिश की हुई,
    हम वहीं के रह गए वहीं, तेरे तकिये के सिरे।

    गर कभी सपनों में अचानक
    फिर मेरा दीदार हो,
    झुठलाना मत
    याद तो तुम्हें मेरी आती ही होगी।

    कहने को छोटी उमर थी इस सफर की पर मगर
    दम उड़ानों की नीयत में वक्त से आगे की थी,
    ज़िंदा है अब भी चिंगारी, फिर भले ही खुद जले
    आग अब भी है कि जलता ज़िन्दगी भर दिल रहे।

    तुमसे शुबहा ना शिकायत
    मैं ही ज़िम्मेदार हूँ,
    मगर झुठलाना मत
    याद तो तुम्हें मेरी आती ही होगी।

    लिखने का कुछ शौक सा था, कुछ अनकही अनसुनी,
    अब है लत, ये हाथ स्याही की तलब के मारे हैं,
    रोज़ का इनका मचलना, रोज़ उपज एक नज़्म की
    ना मायने अदब-ओ-ज़बान के, हर किस्से कहानी तुम्हारे हैं।

    माना तुम हो दूर इतनी
    मुझसे कोई नाता नहीं,
    झुठला दो फिर भी इस झूठ को
    क्योंकि याद तो तुम्हें मेरी आती ही होगी।

  • “चलो चलें” – Poem

    चलो चलें,

    कि अब जो रास्ते मुख़ातिब हुए,
    वो नज़रों के दायरे में पहले ना थे।

    कि ख़्वाब जो बंद लिफाफों में रखे,
    काग़ज़ों के पुलिंदों से गहरे ना थे।

    कि ढल गया है सूरज, पता है।
    दागदार चाँद आज भी दगाबाज़ है।

    कि जितना लंबा साथ था,
    आज हमउम्र उसकी बस याद है।

    कि तन्हा यहाँ कब तक करूँ गुज़ारा,
    हर जगह मेरा ही सामान है।

    कि ढूँढ है तुम्हारी यहाँ वहाँ,
    पर तुम यहाँ कहाँ।
    तुम हो वहाँ जहाँ
    ना मेरा कोई नामोनिशान है।

    कि एकबारगी तुम कोस लेतीं,
    मैं खुद दिन में सौ मर्तबा अपना ही गुनाहगार हूँ।

    कि हक़ीक़त थीं तुम मेरी,
    कोई सपना नहीं।
    किस मुँह से मैं खुद को जवाब दूँ।

    कि खो चुका हूँ एक हिस्सा अपना मैं
    यादों की बारात में।

    कि धंस चुकी है ज़िंदा लाश, बाकी जितनी,
    ज़िंदगी के शमशान में।

    कि हाथ में मेरे हैं कुछ चिथड़े
    दामन-ए- उम्मीद के।

    कि थक गया हूँ मैं, सुस्ता लूँ ज़रा,
    मूँद आँखें संग आग़ाज़-ए-शब के।