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  • “कौन हो तुम” – Poem

    “कौन हो तुम” – Poem

    कौन हो तुम?
    जो बांधते हो मुझे मेरी ही पौराणिक छवि से
    और दागते हो आज ये सवाल
    कि क्या मैं मैं हूँ कि नहीं?

    कौन हो तुम?
    जो मेरे सवालों के मेरे ही जवाबों को
    अपने सवालों की कसौटी पर कसते हो
    ये कहते हुए कि तुम तो ऐसे थे नहीं?

    कौन हो तुम?
    जिसके अपने अज्ञात सत्य की तलाश
    मेरे अर्धसत्य में निहित है
    परन्तु इसका मुझे कोई ज्ञान नहीं?

    कौन हो तुम?
    जिसका अंधविश्वास कायरता की बुनियाद पर
    मेरी दिशा को दिशाहीन ठहराता है
    और मेरे विश्वास को मारी हुई मति?

    कौन हो तुम?
    जिसकी डगमगाती नींव को
    मेरे प्रश्नों से कम्पन महसूस होती है
    और मैं ज्ञात होता हूँ शत्रुरूपी?

    कौन हो तुम?
    क्यूंकि जो भी हो तुम
    मेरे दोस्त, कदापि नहीं।