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  • “गुम” – Poem

    “गुम” – Poem

    मैं गुम हो चला हूँ,
    कहीं खो गया हूँ,
    लावारिस पड़ा हूँ,
    कहाँ आ गया हूँ?

    ये राहें नई सी,
    नज़ारे पुराने,
    कदम आगे-आगे,
    समय पीछे भागे।

    है डर संगी-साथी,
    तन्हाई परछाईं,
    हूँ बेड़ी मैं खुद की,
    मैं खुद की रिहाई।

    धुंधले कुछ इरादे,
    बदनीयत के तकाज़े,
    शराफत का चोला,
    मासूमियत के लबादे।

    मैं थक सा गया हूँ,
    बताता नहीं हूँ,
    कईं नज़रें चुप हैं,
    कईं चेहरे गुम हैं।

    मैं भी गुमशुदा हूँ,
    वहीं खो गया हूँ,
    ना हक़ हूँ किसी का,
    यहीं घुल गया हूँ।

    – absinraw