मेरी प्यास से सूखे हुए चेहरे की दरारें नहीं,
आँखों में पानी को चाहने की जद्दोज़हद देखो।
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“चलो चलें” – Poem
चलो चलें,
कि अब जो रास्ते मुख़ातिब हुए,
वो नज़रों के दायरे में पहले ना थे।कि ख़्वाब जो बंद लिफाफों में रखे,
काग़ज़ों के पुलिंदों से गहरे ना थे।कि ढल गया है सूरज, पता है।
दागदार चाँद आज भी दगाबाज़ है।कि जितना लंबा साथ था,
आज हमउम्र उसकी बस याद है।कि तन्हा यहाँ कब तक करूँ गुज़ारा,
हर जगह मेरा ही सामान है।कि ढूँढ है तुम्हारी यहाँ वहाँ,
पर तुम यहाँ कहाँ।
तुम हो वहाँ जहाँ
ना मेरा कोई नामोनिशान है।कि एकबारगी तुम कोस लेतीं,
मैं खुद दिन में सौ मर्तबा अपना ही गुनाहगार हूँ।कि हक़ीक़त थीं तुम मेरी,
कोई सपना नहीं।
किस मुँह से मैं खुद को जवाब दूँ।कि खो चुका हूँ एक हिस्सा अपना मैं
यादों की बारात में।कि धंस चुकी है ज़िंदा लाश, बाकी जितनी,
ज़िंदगी के शमशान में।कि हाथ में मेरे हैं कुछ चिथड़े
दामन-ए- उम्मीद के।कि थक गया हूँ मैं, सुस्ता लूँ ज़रा,
मूँद आँखें संग आग़ाज़-ए-शब के। -
“क्या से क्या बन गए” – Poem
टूट कर बिखरे हुए उम्मीद की मेरी,
कंकड़ ये कांच के हैं अब नासूर बन गए।जिस इबादत के नशे में धुत था मैं कामिल,
उस ख़ुदा के अश्क साझा शौक बन गए।वक़्त ही मरहम है, दिल के घाव गहरे हैं,
कुछ रश्क भरी हैं ख्वाहिशें, जिन पर सब पहरे हैं।दरख़्त-ए-दिल की शाखों में जितने घरोंदे थे,
मुफलिसी की हर परिंदे के फरमान बन गए।हम फ़ेहरिस्त-ए-आरज़ू पर दर्ज़े के अव्वल थे,
ज़िद से नाकारा आशिको में नाम कर गए।।

