चलो चलें,
कि अब जो रास्ते मुख़ातिब हुए,
वो नज़रों के दायरे में पहले ना थे।
कि ख़्वाब जो बंद लिफाफों में रखे,
काग़ज़ों के पुलिंदों से गहरे ना थे।
कि ढल गया है सूरज, पता है।
दागदार चाँद आज भी दगाबाज़ है।
कि जितना लंबा साथ था,
आज हमउम्र उसकी बस याद है।
कि तन्हा यहाँ कब तक करूँ गुज़ारा,
हर जगह मेरा ही सामान है।
कि ढूँढ है तुम्हारी यहाँ वहाँ,
पर तुम यहाँ कहाँ।
तुम हो वहाँ जहाँ
ना मेरा कोई नामोनिशान है।
कि एकबारगी तुम कोस लेतीं,
मैं खुद दिन में सौ मर्तबा अपना ही गुनाहगार हूँ।
कि हक़ीक़त थीं तुम मेरी,
कोई सपना नहीं।
किस मुँह से मैं खुद को जवाब दूँ।
कि खो चुका हूँ एक हिस्सा अपना मैं
यादों की बारात में।
कि धंस चुकी है ज़िंदा लाश, बाकी जितनी,
ज़िंदगी के शमशान में।
कि हाथ में मेरे हैं कुछ चिथड़े
दामन-ए- उम्मीद के।
कि थक गया हूँ मैं, सुस्ता लूँ ज़रा,
मूँद आँखें संग आग़ाज़-ए-शब के।
