“बचपन से पचपन” – Poem

है एक समय की बात पुरानी ,
अजब कहानी।

शुरुआत उसकी दमदार बड़ी!
अँखियाँ आपस लड़ हार मरी।

था एक लड़का,
और एक लड़की।
यहीं हर बार तो होता है।

पहले क्यूटी है, बाबू, शोना है,
फिर तो बस, रोना है।

पर इनका प्यार पुराना था,
जैसे वो बचपन से पचपन वाला..

लड़का थोड़ा दीवाना था..
ख्वाब हॉलीवुड,
खुद बॉलीवुड।

लड़की रहती मद्धम आंच पे।
ना कभी उबलती,
ना तवे से उतरती।

बर्तन हमेशा बजते..
घर-घर की यहीं कहानी।
फिर भी गाडी इनकी थी पटरी पर..
वो लड़की ना थी कम दीवानी..

जोड़ी रहे सलामत!
यहीं दुआ सब देते थे..
अँधेरे ने पर कब किसी की मानी है..

रौशनी जब होती है चरम पर,
बस! तभी तो उसे अपनी धाक जमानी है..

कुछ किलोमीटर आ गए बीच में
तो क्या हुआ?
देख लेंगे इनको भी!
ऐसा दोनों ने सोचा था..

लड़की बोली,
ये दायरा है मेरा.
इससे बाहर मत जाना.

पर जो ना बोला था,
वही तो होना था..
बस थोड़ी सी चहलक़दमी,

बाहर दुनिया अलग थी।
नए लोग, नयी रीत..
नए तबके..

ये सब तो नया है!
सिर्फ लड़के ने ही तो देखा है!
और वो दायरा छोटा पड़ गया..

बाहर की चमक थी,
फीकी तो पड़नी ही थी..
आखिर घर तो घर ही होता है।

यहीं तो गलत कर गया दीवाना.
दीवानापन धीमे-धीमे धुंधला गया..

वो दायरा मजबूरी नहीं थी,
विश्वास था जिसे जुठला दिया.

अब पछताए क्या होत है,
जब चिड़िया चुग गयी खेत..

वो प्यार था ना,
बचपन से पचपन वाला?
बीत गए थे उनके पचपन साल..

वो क्या है ना,
जो दायरा था ना!
उसके बाहर टाइम भागता थोड़ा जल्दी है..

क्या कहा?
दूसरा मौका?
कहा था ना, लड़की है,
पर कम दीवानी नहीं..

प्यार में धोखा तो कोई झेल भी जाये,
विश्वास में धोखा..
इतना आसान नहीं।

चलो कोई बात नहीं!

समय सब ठीक कर देगा..
भले ही ये घाव काफी गहरा है..

आप पर थोड़ा ध्यान रखियेगा..
प्यार भले ही बचपन का हो,
उसपे भी पचपन का पहरा है..

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