झुठलाना मत
याद तो तुम्हें मेरी आती ही होगी।
घाट की आड़ में जब चाँद चुप छुपता रहा,
तारों की चादर से लिपटी नींद भी जाती रही,
तुम थीं, मैं था, रात थी खामोशी के संग साथ में,
लफ़्ज़ों का क्या काम था जब सांसों के संग सांस थी।
कदमों का रुख उस डगर हो
जब टिमटिमाती रात में,
झुठलाना मत
याद तो तुम्हें मेरी आती ही होगी।
वो समंदर का किनारा रेत के टीले तले,
और तुम्हारी अंगड़ाइयाँ उस तपन की छाँव में,
शाम का मंजर सुहाना, रात बारिश की हुई,
हम वहीं के रह गए वहीं, तेरे तकिये के सिरे।
गर कभी सपनों में अचानक
फिर मेरा दीदार हो,
झुठलाना मत
याद तो तुम्हें मेरी आती ही होगी।
कहने को छोटी उमर थी इस सफर की पर मगर
दम उड़ानों की नीयत में वक्त से आगे की थी,
ज़िंदा है अब भी चिंगारी, फिर भले ही खुद जले
आग अब भी है कि जलता ज़िन्दगी भर दिल रहे।
तुमसे शुबहा ना शिकायत
मैं ही ज़िम्मेदार हूँ,
मगर झुठलाना मत
याद तो तुम्हें मेरी आती ही होगी।
लिखने का कुछ शौक सा था, कुछ अनकही अनसुनी,
अब है लत, ये हाथ स्याही की तलब के मारे हैं,
रोज़ का इनका मचलना, रोज़ उपज एक नज़्म की
ना मायने अदब-ओ-ज़बान के, हर किस्से कहानी तुम्हारे हैं।
माना तुम हो दूर इतनी
मुझसे कोई नाता नहीं,
झुठला दो फिर भी इस झूठ को
क्योंकि याद तो तुम्हें मेरी आती ही होगी।


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