आज रविवार है। छुट्टी का दिन है। इसलिए थोड़ा आलस लाज़मी है। मस्त मटन बनाएंगे दोपहर में और खाकर सुस्ताएंगे। सर्दी की भीनी-भीनी धूप का लुत्फ उठाएंगे। आप भी थोड़ा अल्सियाइये, और बस इन दो पंक्तियों से काम चलाइए।
कि ग़म का तो ढिंढोरा भी पीट लूं सड़क पर,
कोशिश कर के देखा है, नज़र ही नहीं लगती।
ये खुशी जो मिली है, दबोच ली है, समेट ली है,
उतार ली है बोतल में, खुद भी काला चश्मा लगाता हूँ।

Leave a comment