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Parallel Perspectives | Senseless Rantings | Different, Little Things

कौन है वहां? उस पार सड़क के
शीशों से बनी एक इमारत, फिर भी हर मंजिल घिरी अंधेरों में
रोशनी सी है बल्ब की शायद, झांकती बड़ी मुश्किल से
फंसी लगती है पर्दों में, या उलझी खिड़की की उन लड़ियों में

कौन है वहां? क्यों? इस वक्त क्या कर रहा है?
जागा हुआ है, या रात के आगोश में सुध खो चुका है?
ख्वाब जी रहा है? ख्वाब बुन रहा है?
या फर्श पर बिखरे हुए कल को आज कोस चुका है?
चाहत है और जीने की, या फिर वो भी खो चुका है?
खटखटाऊं गर खिड़की तो खोलेगा, या सो चुका है?

कौन है वहां? उस पार सड़क के
शीशों से बनी कई इमारत, हर मंजिल घिरी अंधेरों में
रोशनी सी है उम्मीदों की शायद, झांकती बड़ी मुश्किल से
फंसी लगती है पर्दों में, या उलझी खिड़की की उन लड़ियों में।

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