“तो ये भी क्या बुरा है” – Poem

कश्मकश नहीं थी ज़िन्दगी,
जो बनकर रह गयी
इक जद्दोजहद,
बस धुंधली सी तस्वीर रह गयी

तूफां से बचते-सहते गर दरार पड़ गयी,
तो ये भी क्या बुरा है।

बारिश की कुछ उम्मीद थी
छाता उठा लिया,
ख़ुदा भी था रूठा सा,
सूरज दहका दिया

बूँदें पसीने की थी जिनसे हम नहा गए,
तो ये भी क्या बुरा है।

तन्हा हम इस सफ़र के
मुसाफिर हो गए,
कुछ साथ हुए, कुछ मोड़ मिले
कुछ राह बदल गए

तन्हाई गर एक हमसफ़र से ज़्यादा साथ दे,
तो ये भी क्या बुरा है।

दुनिया में सब निराले,
अँखियाँ मूँद भ्रांतियां पाले
इंसानियत से ना सरोकार,
है अंधे आँखों वाले

जब अंधे की इंसानियत आँखों पर भारी पड़े,
तो ये भी क्या बुरा है।

 

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